उदाहरण 1: equity में long-term लाभ
मान लीजिए रूपा नाम की एक शिक्षिका ने कुछ listed शेयर ₹3,20,000 में ख़रीदे थे और 40 महीने बाद ₹7,45,000 में बेचती है। ब्रोकरेज आदि ₹1,500 लगता है। उसने इस साल कोई और long-term equity लाभ नहीं कमाया।
- शुद्ध बिक्री = 7,45,000 − 1,500 = ₹7,43,500।
- लाभ = 7,43,500 − 3,20,000 = ₹4,23,500। 40 महीने रखा, यानी long-term।
- सालाना छूट ₹1,25,000 के बाद कर-योग्य लाभ = ₹2,98,500।
- 12.5% पर कर = ₹37,312.50।
- cess 4% = ₹1,492.50, कुल कर = ₹38,805।
- प्रभावी दर = 38,805 ÷ 4,23,500 ≈ 9.16%।
- कर के बाद हाथ में रकम ≈ ₹7,04,695।
अगर रूपा इस साल पहले ही ₹80,000 का equity long-term लाभ दर्ज कर चुकी होती, तो छूट में सिर्फ़ ₹45,000 बचते। तब कर-योग्य लाभ ₹3,78,500 होता और कुल कर लगभग ₹49,205 बनता।
उदाहरण 2: short-term लाभ
एक विद्यार्थी ने ₹1,50,000 के शेयर ख़रीदे और 8 महीने बाद ₹1,80,000 में बेच दिए। 12 महीने से कम रखने से यह short-term है। लाभ ₹30,000 पर 20% के हिसाब से कर ₹6,000 और cess ₹240, कुल ₹6,240 बनता है। यहाँ सालाना ₹1.25 लाख की छूट लागू नहीं होती, क्योंकि वह long-term लाभ के लिए है।
उदाहरण 3: पुरानी ज़मीन और indexation की तुलना
कल्पना कीजिए कि एक परिवार ने वित्त वर्ष 2014-15 में ₹28,00,000 में एक प्लॉट ख़रीदा और 2026-27 में ₹46,00,000 में बेचा, ख़र्च ₹46,000। शुद्ध बिक्री ₹45,54,000।
- बिना indexation: लाभ = 45,54,000 − 28,00,000 = ₹17,54,000, 12.5% पर कर ₹2,19,250।
- Indexation के साथ: CII 240 (2014-15) और 384 (2026-27) लेकर indexed लागत = 28,00,000 × 384 ÷ 240 = ₹44,80,000। लाभ = ₹74,000, 20% पर कर ₹14,800।
- कम कर वाला तरीक़ा indexation का है। cess के बाद कुल कर = ₹15,392।
यानी इस उदाहरण में प्लॉट के दाम महँगाई के लगभग बराबर बढ़े थे, इसलिए indexation वाला तरीक़ा बहुत सस्ता पड़ा। दाम बहुत ज़्यादा बढ़े हों तो अक्सर बिना indexation वाला तरीक़ा कम कर देता है। यही कारण है कि पेज दोनों दिखाता है।
उदाहरण का सबक: संपत्ति के प्रकार, रखने की अवधि और ख़रीद के समय के आधार पर एक ही रुपये का लाभ बहुत अलग कर में बदल सकता है।