मान लीजिए एक दुकानदार के कार्ड पर ₹80,000 बकाया है। दर 3.5% प्रति माह, minimum due 5% और न्यूनतम ₹200, GST चालू। ये आँकड़े उदाहरण के हैं, आपका कार्ड अलग हो सकता है।
पहला महीना
- ब्याज = 80,000 × 3.5% = ₹2,800।
- उस पर 18% GST = ₹504। कुल ब्याज + GST = ₹3,304।
- कुल देय = 80,000 + 3,304 = ₹83,304।
- 5% = ₹4,165, जो न्यूनतम ₹200 से बड़ा है और ब्याज + GST से भी बड़ा है। इसलिए minimum due ₹4,165।
- भुगतान के बाद बाक़ी बकाया = 83,304 − 4,165 = ₹79,139।
यानी ₹4,165 भरने के बाद भी बकाया सिर्फ़ ₹861 घटा, क्योंकि लगभग पूरा भुगतान ब्याज और GST में चला गया।
सिर्फ़ minimum due भरते रहें तो
हर महीने minimum due घटता जाता है क्योंकि बकाया घटता है। सिमुलेशन के मुताबिक़ ऐसे में कार्ड चुकने में लगभग 320 महीने, यानी 26 साल 8 महीने लगते हैं। इसमें ब्याज लगभग ₹2.51 लाख और GST लगभग ₹45,000 बनता है, कुल भुगतान लगभग ₹3.76 लाख। मूल बकाए के मुक़ाबले ब्याज और GST लगभग 370% है, यानी ₹80,000 के लिए लगभग तीन गुना से ज़्यादा ब्याज।
तय रकम भरें
अगर वही व्यक्ति हर महीने ₹6,000 भरे, तो कार्ड लगभग 20 महीनों में चुक जाता है। कुल ब्याज लगभग ₹32,700 और GST लगभग ₹5,900, यानी ब्याज और GST मूल बकाए का लगभग 48%।
minimum due के ऊपर ₹2,000 और भरें
अगर वह minimum due के ऊपर हर महीने ₹2,000 और भरे, तो कार्ड लगभग 34 महीने में चुक जाता है। कुल ब्याज लगभग ₹45,000 और GST लगभग ₹8,100 होता है, यानी लगभग 66%। यह भी काफ़ी बेहतर है, सिर्फ़ minimum due से तो कई गुना बेहतर।
इस उदाहरण से तीन बातें साफ़ होती हैं। पहली, minimum due भरने पर बकाया बहुत धीरे घटता है। दूसरी, थोड़ी सी अतिरिक्त रकम भी साल गिनने की जगह महीने गिनने लगती है। तीसरी, तय रकम भरने की आदत सबसे प्रभावी है।