मान लीजिए एक रिटायर्ड बैंक कर्मचारी ₹60 लाख का 2BHK ख़रीदते हैं, ख़रीद ख़र्च ₹4 लाख। मासिक किराया ₹18,000, साल में 1.5 महीने घर ख़ाली रहने की संभावना, सालाना ख़र्च ₹24,000, किराये की बढ़त 4%, भाव-वृद्धि 5%, 12 साल रखने की योजना, बिक्री ख़र्च 1%, FD की दर 7%।
- कुल लागत = 60,00,000 + 4,00,000 = ₹64,00,000।
- Gross yield = 18,000 × 12 ÷ 60,00,000 × 100 = 3.6%।
- पहले साल का net किराया = 18,000 × 10.5 − 24,000 = 1,89,000 − 24,000 = ₹1,65,000।
- Net yield = 1,65,000 ÷ 64,00,000 = लगभग 2.58%।
- केवल किराये से लागत निकलने में लगभग 38.8 साल।
- 12 साल में कुल net किराया लगभग ₹25.5 लाख।
- 12 साल बाद क़ीमत 60,00,000 × 1.05¹² ≈ ₹1.08 करोड़, बिक्री ख़र्च 1% घटाकर लगभग ₹1.067 करोड़।
- कुल लाभ = 1.067 करोड़ + 25.5 लाख − 64 लाख ≈ ₹68.2 लाख।
- IRR लगभग 6.95%।
- उसी ₹64 लाख को 7% की FD में रखने पर 12 साल बाद लगभग ₹1.44 करोड़।
यानी यहाँ IRR (6.95%) FD की 7% से मामूली कम निकला और calculator चेतावनी दिखाएगा। अब भाव-वृद्धि का अनुमान बदलें। 2% सालाना हो तो IRR लगभग 4.4%। 8% हो तो लगभग 9.6%। यही दिखाता है कि प्रॉपर्टी का नतीजा किराये से ज़्यादा भाव-वृद्धि के अनुमान पर टिका होता है, और वह अनुमान सबसे अनिश्चित हिस्सा है। ख़ाली महीने 1.5 से 3 करने पर IRR लगभग 6.5% पर आ जाता है। ये सभी मान लिए गए आँकड़े हैं, असली नतीजे अलग हो सकते हैं।
उदाहरण: Net yield 2.6% बहुत छोटा लगता है, और भारत के शहरों में किराये का प्रतिशत अक्सर कम ही रहता है। इसलिए निर्णय अकेले किराये से नहीं, किराये और भाव-वृद्धि दोनों से होता है, जैसा इस पन्ने की जानकारी भी कहती है।