प्रॉपर्टी की असली कमाई

Property ROI Calculator

ख़रीद, किराया, लोन और बिक्री की मान्यताएँ डालिए: कुल फ़ायदा, ROI और सालाना IRR का अंदाज़ा देखिए।

  • कुल फ़ायदा और ROI
  • सालाना IRR
  • किराया और खर्च
  • लोन का असर
  • भाव-बढ़त की तालिका
  • PDF रिपोर्ट
आशुग्या की सलाहकिराया सिर्फ़ एक हिस्सा है; ख़रीद-बिक्री के खर्च, EMI और भाव की बढ़त मिलकर असली रिटर्न बनाते हैं।
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Results are estimates for educational use only — not financial, tax or investment advice.
नतीजे सिर्फ़ शैक्षणिक अनुमान हैं — वित्तीय, कर या निवेश सलाह नहीं।

प्रॉपर्टी का रिटर्न सिर्फ़ किराया नहीं होता

  • प्रॉपर्टी की कमाई तीन जगह से आती है: किराया, भाव की बढ़त और (लोन हो तो) leverage। खर्च भी तीन जगह लगते हैं: ख़रीद-बिक्री की लागत, सालाना रखरखाव और लोन का ब्याज।
  • भाव की सालाना बढ़त, किराया, खाली रहने के महीने और ब्याज दर आपकी मान्यताएँ हैं, जो उदाहरण के रूप में भरी हैं। इनमें से कुछ भी पक्का नहीं है; प्रॉपर्टी का भाव गिर भी सकता है और किराया रुक भी सकता है।
  • ख़रीद पर लगने वाली स्टांप ड्यूटी और रजिस्ट्री का प्रतिशत हर राज्य में अलग है, इसलिए वह भी इनपुट है। कर, GST और होम लोन की कर छूट यहाँ शामिल नहीं हैं। यह शैक्षणिक अनुमान है।

For education only; verify with official sources. / सिर्फ़ शिक्षा के लिए; आधिकारिक स्रोतों से जाँच लें।

How this is calculated / यह कैसे निकाला गया

Sale price = price x (1 + appreciation)^years. Rent income = monthly rent x (12 - vacant months) x years. Costs = annual running cost x years. Loan EMI = P x i x (1+i)^n / ((1+i)^n - 1), i = rate/12/100, n = tenure in months; balance after k months = P x ((1+i)^n - (1+i)^k) / ((1+i)^n - 1). Net sale proceeds = sale price - sale cost % x sale price - loan balance. Profit = net sale proceeds + rent - running costs - EMIs paid - own initial money (price + buying cost + one-time cost - loan). ROI = profit / (own initial money + EMIs paid). IRR is solved on monthly cash flows and annualised. Every rate here is an example input; stamp duty and registration vary by state.

बिक्री भाव = भाव × (1 + बढ़त)^साल। किराये की आय = मासिक किराया × (12 − खाली महीने) × साल। खर्च = सालाना खर्च × साल। लोन EMI = P × i × (1+i)^n ÷ ((1+i)^n − 1), जहाँ i = दर ÷ 12 ÷ 100 और n = महीनों में अवधि; k महीने बाद बकाया = P × ((1+i)^n − (1+i)^k) ÷ ((1+i)^n − 1)। बिक्री से हाथ आई रकम = बिक्री भाव − बिक्री खर्च % × बिक्री भाव − बकाया लोन। फ़ायदा = हाथ आई रकम + किराया − चलते खर्च − चुकाई EMI − शुरू में अपनी रकम (भाव + ख़रीद खर्च + एक बार का खर्च − लोन)। ROI = फ़ायदा ÷ (शुरू की अपनी रकम + चुकाई EMI)। IRR मासिक नकद-प्रवाह पर हल करके सालाना में बदला गया है। यहाँ हर दर उदाहरण वाला इनपुट है; स्टांप ड्यूटी और रजिस्ट्री राज्य के हिसाब से अलग हैं।

Reviewed on / समीक्षा की तारीख़: 14 Oct 2026

Estimate only, for learning — not advice. Educational estimate. Appreciation, rent, vacancy, loan rate and costs are your assumptions, shown with example values, and none is guaranteed. Property prices can fall and rent can stop. Stamp duty varies by state; income tax, capital gains tax and home-loan tax benefits are not included. Not investment advice. Returns are not guaranteed and actual results will differ; this is not investment, tax or financial advice. Please speak to a SEBI-registered adviser or a qualified professional before you decide.
सिर्फ़ अनुमान, सीखने के लिए — सलाह नहीं। यह शैक्षणिक अनुमान है। भाव की बढ़त, किराया, खाली महीने, लोन की दर और खर्च आपकी मान्यताएँ हैं जिन्हें उदाहरण मान के साथ भरा गया है, इनमें से कुछ भी गारंटीशुदा नहीं है। प्रॉपर्टी का भाव गिर सकता है और किराया रुक सकता है। स्टांप ड्यूटी राज्य के हिसाब से अलग है; आयकर, पूँजीगत लाभ कर और होम लोन की कर छूट शामिल नहीं हैं। यह निवेश की सलाह नहीं है। रिटर्न की कोई गारंटी नहीं है और असली नतीजे अलग होंगे; यह निवेश, कर या वित्तीय सलाह नहीं है। फ़ैसला लेने से पहले SEBI-पंजीकृत सलाहकार या योग्य विशेषज्ञ से बात करें।
संक्षेप में
  • प्रॉपर्टी का रिटर्न किराया, भाव की बढ़त और लोन के असर से बनता है; ख़रीद-बिक्री के खर्च और EMI इसे घटाते हैं।
  • ROI कुल फ़ायदे को कुल लगी अपनी रकम से भाग देता है। IRR समय को भी जोड़कर सालाना दर बताता है।
  • लोन हर बार रिटर्न नहीं बढ़ाता। अगर प्रॉपर्टी की कमाई ब्याज दर से कम रही तो लोन रिटर्न घटाता है।
  • सारी दरें और बढ़त मान्यताएँ हैं। भाव गिर सकता है, किराया रुक सकता है; कर और कर छूट शामिल नहीं।
खुलने वाली विंडो में “PDF के रूप में सेव करें” चुनें। रिपोर्ट में आपके डाले हुए आँकड़े, नतीजा और चार्ट आते हैं।

उदाहरण: तीन अलग-अलग हालात

नीचे के पात्र और संख्याएँ काल्पनिक हैं; मक़सद सिर्फ़ यह दिखाना है कि अलग हालात में नतीजा कैसे बदलता है।

राहुल: लोन के साथ पाँच साल

₹60 लाख का फ़्लैट, ₹35 लाख का लोन (9%, 20 साल), किराया ₹18,000, 5 साल बाद बिक्री। भाव-बढ़त 5% और बाक़ी दरें उदाहरण।

शुरू में अपनी रकम
₹32,20,000
चुकाई कुल EMI
₹18,89,425
बिक्री क़ीमत
₹76,57,689
कुल फ़ायदा
₹1,76,941
ROI
3.46%
सालाना IRR
0.93%

भाव और किराया बढ़ने के बावजूद ब्याज और खर्च ने अधिकतर फ़ायदा खा लिया। इसी फ़्लैट को बिना लोन के लेने पर ROI 24.87% और IRR 4.79% आता, यानी यहाँ लोन ने रिटर्न घटाया।

सीमा: दस साल, मध्यम लोन

₹45 लाख की प्रॉपर्टी, ₹30 लाख का लोन (9%, 15 साल), किराया ₹15,000, 10 साल बाद बिक्री। भाव-बढ़त 6% (उदाहरण)।

शुरू में अपनी रकम
₹20,15,000
चुकाई कुल EMI
₹36,51,360
बिक्री क़ीमत
₹80,58,815
कुल फ़ायदा
₹21,96,047
ROI
38.76%
सालाना IRR
5.57%

लंबी अवधि में भाव की बढ़त और लोन का बड़ा हिस्सा चुकने से फ़ायदा बढ़ा। पर यह बढ़त 6% सालाना की मान्यता पर टिका है, जो गारंटी नहीं।

अजय: कमज़ोर भाव और खाली महीने

₹30 लाख की प्रॉपर्टी, ₹20 लाख का लोन (9%, 20 साल), किराया ₹12,000, साल में 2 महीने खाली, 3 साल बाद बिक्री। भाव-बढ़त सिर्फ़ 2% (उदाहरण)।

शुरू में अपनी रकम
₹12,80,000
चुकाई कुल EMI
₹6,47,803
बिक्री क़ीमत
₹31,83,624
कुल नतीजा
−₹3,64,782
ROI
−18.92%
सालाना IRR
−9.11%

कम भाव-बढ़त और खाली महीनों के साथ ब्याज का बोझ मिला तो नतीजा नुकसान में रहा। छोटी अवधि में ख़रीद-बिक्री के खर्च भी भारी पड़ते हैं।

राहुल का मामला: भाव की सालाना बढ़त बदलने पर

राहुल का मामला: भाव की सालाना बढ़त बदलने पर
मानी हुई बढ़तबिक्री क़ीमतकुल फ़ायदाROI
−3%₹51,52,404−₹23,03,291−45.08%
0%₹60,00,000−₹14,64,171−28.66%
3%₹69,55,644−₹5,18,083−10.14%
6%₹80,29,353₹5,44,88910.66%
9%₹92,31,744₹17,35,25533.96%

सारी बढ़त मान्यताएँ हैं। देखिए कि कम बढ़त पर लोन वाला सौदा कितनी तेज़ी से नुकसान में जाता है।

किराया-आय बनाम क़ीमत (11 महीने किराया मानकर)

किराया-आय बनाम क़ीमत (11 महीने किराया मानकर)
क़ीमतमासिक किरायासालाना किराया-आय
₹30 लाख₹12,0004.4%
₹45 लाख₹15,0003.67%
₹60 लाख₹18,0003.3%
₹60 लाख₹25,0004.58%

किराया-आय सिर्फ़ किराये से सालाना कमाई का प्रतिशत है; भाव की बढ़त और खर्च इसमें नहीं हैं। संख्याएँ उदाहरण हैं।

त्वरित संदर्भ: प्रॉपर्टी ROI

त्वरित संदर्भ: प्रॉपर्टी ROI
बिक्री क़ीमतक़ीमत × (1 + बढ़त)^साल
शुरू में अपनी रकमक़ीमत + ख़रीद खर्च + एक बार का खर्च − लोन
कुल फ़ायदाबिक्री से हाथ आई रकम + किराया − चलते खर्च − चुकाई EMI − शुरू की अपनी रकम
ROIफ़ायदा ÷ (शुरू की अपनी रकम + चुकाई EMI)
IRRमासिक नकद-प्रवाह पर हल, फिर सालाना में
किराया-आयमासिक किराया × (12 − खाली महीने) ÷ क़ीमत
स्टांप ड्यूटीराज्य के हिसाब से अलग; इनपुट में अपनी दर डालें
इस पेज में क्या नहींआयकर, पूँजीगत लाभ कर, GST, कर छूट, प्रोसेसिंग फ़ीस, किराये की बढ़त

Property ROI Calculator क्या करता है और कैसे काम आता है?

सरल व्याख्या

यह calculator क्या करता है

प्रॉपर्टी ख़रीदने की बात होती है तो अक्सर यही सुनाई देता है: "किराया आ जाएगा, भाव बढ़ेगा, और लोन की किस्त भी निकल जाएगी।" सुनने में सब अच्छा लगता है, पर असल में कितना बचेगा, यह कोई नहीं बताता। Property ROI Calculator इसी का हिसाब लगाता है। यह ख़रीद से लेकर बिक्री तक का पूरा चक्र देखता है: ख़रीद की क़ीमत, ख़रीद के खर्च, सजावट या मरम्मत, किराया, चलते खर्च, लोन की किस्तें, बेचते समय के खर्च और आख़िर में बिक्री से मिली रकम।

नतीजे में आपको कुल अनुमानित फ़ायदा, ROI और सालाना IRR मिलते हैं। ROI बताता है कि आपकी लगाई कुल रकम पर कुल कितने प्रतिशत फ़ायदा हुआ। IRR समय को भी गिनता है: कौन-सा पैसा कब गया और कब आया, और उसे एक सालाना दर के रूप में बताता है। साथ में यह भी दिखता है कि बिना लोन के यही सौदा कैसा रहता, और किराये से सालाना आय क़ीमत का कितना प्रतिशत है।

यह एक शैक्षणिक अनुमान है। भाव की बढ़त, किराया, खाली रहने के महीने और ब्याज दर आपकी मान्यताएँ हैं, जो उदाहरण के रूप में भरी हैं। इनमें से कोई भी पक्का नहीं है। प्रॉपर्टी का भाव गिर भी सकता है और किराया रुक भी सकता है। आयकर, पूँजीगत लाभ कर और होम लोन की कर छूट इसमें शामिल नहीं हैं।

किसके काम का है

  • वे लोग, जो निवेश के लिए फ़्लैट या दुकान ख़रीदने की सोच रहे हैं और जानना चाहते हैं कि सच में कितना फ़ायदा बच सकता है।
  • वे जो किसी रिश्तेदार या दलाल से "इसमें ज़बरदस्त रिटर्न है" सुनकर सोच रहे हैं कि इसे ख़ुद कैसे जाँचें।
  • वे निवेशक जो प्रॉपर्टी की तुलना शेयर, म्यूचुअल फ़ंड या FD जैसे विकल्पों से करना चाहते हैं। IRR सालाना दर है, इसलिए तुलना में काम आता है।
  • वे जो जानना चाहते हैं कि लोन लेना रिटर्न बढ़ाएगा या घटाएगा।
  • वे परिवार, जो विरासत में मिली प्रॉपर्टी को बेचें या किराये पर रखें, इसका फ़ैसला करने से पहले मोटा अंदाज़ा लेना चाहते हैं।
  • विद्यार्थी और शिक्षक, जिन्हें ROI, IRR और leverage का एक साफ़ उदाहरण चाहिए।

अगर आप रहने के लिए घर ख़रीद रहे हैं, किराये पर देने के लिए नहीं, तो Rent vs Buy जैसा calculator ज़्यादा उपयुक्त है। यह पेज निवेश की नज़र से है।

कौन-सी जानकारी डालनी होती है

पेज पर बारह इनपुट हैं।

  • ख़रीद क़ीमत (₹): शुरुआती मान ₹60,00,000।
  • ख़रीद के खर्च (क़ीमत का %): स्टांप ड्यूटी, रजिस्ट्री और दलाली। शुरुआती मान 7%, जो उदाहरण है। यह राज्य के हिसाब से अलग होती है, इसलिए अपने राज्य की दर डालिए।
  • एक बार का खर्च (₹): सजावट, मरम्मत या फ़र्नीचर। शुरुआती मान ₹3,00,000।
  • कितने साल रखेंगे: 1 से 30 साल। शुरुआती मान 5 साल।
  • भाव की मानी हुई सालाना बढ़त: −5% से 15% तक। शुरुआती मान 5%। यह सिर्फ़ मान्यता है, वादा नहीं। ऋणात्मक मान डालकर भी देखिए।
  • मासिक किराया (₹): किराये पर न दें तो 0। शुरुआती मान ₹18,000।
  • साल में खाली रहने के महीने: शुरुआती मान 1।
  • सालाना खर्च (₹): सोसाइटी शुल्क, प्रॉपर्टी टैक्स और मरम्मत। शुरुआती मान ₹36,000।
  • बेचते समय खर्च (%): दलाली आदि। शुरुआती मान 1%।
  • होम लोन की रकम (₹): लोन न हो तो 0। शुरुआती मान ₹35,00,000। यह क़ीमत से ज़्यादा नहीं हो सकती।
  • लोन की ब्याज दर और अवधि: शुरुआती मान 9% और 20 साल। दर उदाहरण है; अपने बैंक की ताज़ा दर डालिए।
टिप: एक ही प्रॉपर्टी के लिए तीन बार चलाइए: भाव-बढ़त कम, मध्यम और ज़्यादा रखकर। सौदे की मज़बूती का अंदाज़ा इन्हीं तीन नतीजों से लगता है।

नतीजे में क्या दिखता है और उसे कैसे पढ़ें

सबसे ऊपर बड़ी संख्या में कुल अनुमानित फ़ायदा दिखता है और उसके नीचे ROI और सालाना IRR। फिर आठ पंक्तियाँ आती हैं।

  • शुरू में अपनी लगाई रकम: ख़रीद क़ीमत, ख़रीद के खर्च और एक बार के खर्च का जोड़, लोन घटाकर।
  • अवधि में चुकाई कुल EMI: लोन की किस्तों का जोड़, जब तक आप प्रॉपर्टी रखते हैं।
  • अनुमानित बिक्री क़ीमत: मानी हुई बढ़त से बनी।
  • बिक्री के बाद लोन चुकाकर हाथ आई रकम: बिक्री क़ीमत में से बेचने का खर्च और बचा हुआ लोन घटाकर।
  • अवधि का कुल किराया और चलते खर्च: खाली महीनों को घटाने के बाद का किराया, और सालाना खर्च का जोड़।
  • बिना लोन के होता तो ROI: तुलना के लिए, ताकि पता चले कि लोन ने रिटर्न बढ़ाया या घटाया।
  • सालाना किराया-आय: सालाना किराया ÷ क़ीमत।

नीचे का संदेश नुकसान की स्थिति में पीला और नहीं तो सूचना वाले नीले रंग में आता है। तालिका में भाव की सालाना बढ़त −3% से 9% तक बदलकर कुल फ़ायदा और ROI दिखते हैं। चार्ट में फ़ायदे के हिस्से, यानी बिक्री से मिली रकम, किराया और खर्च तथा शुरू की रकम, पट्टियों में आते हैं।

कभी-कभी IRR की जगह "IRR तय नहीं" लिखा आता है। यह तब होता है जब नकद-प्रवाह ऐसे हों कि सालाना दर निकल ही न सके। तब ROI और कुल फ़ायदा देखिए।

इसे समझदारी से इस्तेमाल करने के तरीके

  • तीन परिदृश्य चलाइए। कम, मध्यम और अच्छी बढ़त पर नतीजे देखिए। अगर सौदा सिर्फ़ अच्छी बढ़त पर ही चलता है, तो वह नाज़ुक है।
  • ख़रीद के खर्च सही रखिए। स्टांप ड्यूटी और रजिस्ट्री का असली प्रतिशत अपने राज्य और ख़रीदार के प्रकार के हिसाब से डालिए। Stamp Duty Calculator की मदद लीजिए।
  • खाली महीने रखिए। किराया पूरे साल मिलेगा, यह मान लेना जोखिम है। एक-दो महीने खाली मानकर चलिए।
  • लोन के साथ और बिना लोन के तुलना देखिए। "बिना लोन के ROI" वाली पंक्ति बताती है कि leverage मदद कर रहा है या नहीं।
  • IRR से अन्य निवेशों की तुलना कीजिए। ROI अवधि पर निर्भर है, IRR सालाना होने से अलग-अलग विकल्पों की तुलना में ज़्यादा उपयोगी है। फिर भी कर और जोखिम का फ़र्क़ याद रखिए।
  • नकदी की ज़रूरत सोचिए। प्रॉपर्टी जल्दी नहीं बिकती। यह पैसा लंबे समय के लिए फँस सकता है।
  • कर का अलग हिसाब कीजिए। किराये की आय पर कर लगता है और बिक्री के मुनाफ़े पर भी। होम लोन की छूट अलग है। कर-सलाहकार से पूछिए।
ध्यान दें: प्रॉपर्टी का अनुमान सबसे ज़्यादा भाव की बढ़त की मान्यता पर टिका होता है। उसे बदलते ही नतीजा बदल जाता है, इसलिए एक ही मान्यता पर भरोसा न कीजिए।

आम ग़लतियाँ और भ्रम

  • सिर्फ़ किराया-आय देखना। 3.3% या 4% की किराया-आय अच्छी लग सकती है या कम, पर वह भाव की बढ़त, खर्च और ब्याज को छोड़ देती है।
  • लोन को हमेशा फ़ायदेमंद मानना। लोन तब रिटर्न बढ़ाता है जब प्रॉपर्टी की कमाई ब्याज दर से ज़्यादा हो। उदाहरण में ऐसा नहीं हुआ।
  • खर्च भूल जाना। ख़रीद-बिक्री की लागत, सोसाइटी शुल्क, मरम्मत और प्रॉपर्टी टैक्स मिलकर बड़ी रकम बनते हैं।
  • भाव की बढ़त को पक्का मान लेना। बीते सालों की बढ़त आगे की गारंटी नहीं। कई इलाक़ों में भाव सालों तक ठहरे रहते हैं या गिरते हैं।
  • किराये को स्थिर और पूरे साल का मानना। किरायेदार बदलते हैं, महीने खाली रहते हैं, और कभी-कभी किराया अटक भी जाता है।
  • ROI और IRR को एक समझना। ROI कुल फ़ायदे का प्रतिशत है, चाहे वह 3 साल में बना हो या 15 में। IRR समय के साथ सालाना दर बताता है।
  • कर और कर छूट भूल जाना। यह पेज दोनों छोड़ता है। असली कमाई कर के बाद कम होगी।
  • छोटी अवधि में बेचने की सोचना। पहले कुछ सालों में ख़रीद-बिक्री के खर्च इतने भारी रहते हैं कि भाव की बड़ी बढ़त चाहिए।
विस्तृत गणना (पढ़ने के लिए खोलें)
गणना कैसे होती है
  1. बिक्री क़ीमत = क़ीमत × (1 + बढ़त)^साल।
  2. ख़रीद के खर्च = क़ीमत × खर्च %।
  3. लोन की EMI = P × i × (1+i)^n ÷ ((1+i)^n − 1), जहाँ i = दर ÷ 12 ÷ 100 और n = अवधि के महीने।
  4. k महीने बाद बकाया लोन = P × ((1+i)^n − (1+i)^k) ÷ ((1+i)^n − 1)।
  5. बिक्री से हाथ आई रकम = बिक्री क़ीमत − बिक्री खर्च − बकाया लोन।
  6. कुल किराया = मासिक किराया × (12 − खाली महीने) × साल। कुल चलते खर्च = सालाना खर्च × साल।
  7. शुरू की अपनी रकम = क़ीमत + ख़रीद के खर्च + एक बार का खर्च − लोन।
  8. कुल फ़ायदा = हाथ आई रकम + किराया − चलते खर्च − चुकाई कुल EMI − शुरू की अपनी रकम।
  9. ROI = कुल फ़ायदा ÷ (शुरू की अपनी रकम + चुकाई कुल EMI)।
  10. IRR: हर महीने का नकद-प्रवाह (किराया − खर्च − EMI) और आख़िर में बिक्री की रकम लेकर वह मासिक दर निकाली जाती है जिस पर कुल नकद-प्रवाह शून्य हो, फिर उसे सालाना में बदला जाता है।
आम ग़लतियाँ और भ्रम
बातसूत्र
बिक्री क़ीमतक़ीमत × (1+बढ़त)^साल
अपनी शुरुआती रकमक़ीमत + खर्च − लोन
कुल फ़ायदाहाथ आई रकम + किराया − खर्च − EMI − शुरुआती रकम
ROIफ़ायदा ÷ (शुरुआती रकम + EMI)

मान्यता है कि किराया और खर्च पूरे समय स्थिर रहते हैं और EMI भी निश्चित रहती है। ब्याज दर बदलने (floating) का असर इसमें नहीं है।

एक पूरा उदाहरण

पेज की शुरुआती संख्याएँ: क़ीमत ₹60,00,000, ख़रीद के खर्च 7%, एक बार का खर्च ₹3,00,000, 5 साल, भाव की बढ़त 5%, किराया ₹18,000 (1 महीना खाली), सालाना खर्च ₹36,000, बिक्री खर्च 1%, लोन ₹35,00,000 पर 9% और 20 साल। (सब उदाहरण।)

  1. ख़रीद के खर्च = 60,00,000 × 7% = ₹4,20,000।
  2. शुरू की अपनी रकम = 60,00,000 + 4,20,000 + 3,00,000 − 35,00,000 = ₹32,20,000।
  3. EMI = 35,00,000 पर 9% और 240 महीनों पर लगभग ₹31,490।
  4. 5 साल में चुकाई EMI = 31,490.41 × 60 = लगभग ₹18,89,425।
  5. 60 महीने बाद बकाया लोन लगभग ₹31,04,747।
  6. बिक्री क़ीमत = 60,00,000 × (1.05)^5 = लगभग ₹76,57,689।
  7. बिक्री खर्च = 1% = ₹76,577। हाथ आई रकम = 76,57,689 − 76,577 − 31,04,747 = लगभग ₹44,76,366।
  8. कुल किराया = 18,000 × 11 × 5 = ₹9,90,000। चलते खर्च = 36,000 × 5 = ₹1,80,000।
  9. कुल फ़ायदा = 44,76,366 + 9,90,000 − 1,80,000 − 18,89,425 − 32,20,000 = लगभग ₹1,76,941।
  10. ROI = 1,76,941 ÷ (32,20,000 + 18,89,425) = 1,76,941 ÷ 51,09,425 = लगभग 3.46%।
  11. सालाना IRR लगभग 0.93%।

अब यही सौदा बिना लोन के सोचिए। तब शुरुआती रकम ₹67,20,000 होती, और कुल फ़ायदा लगभग ₹16,71,112। ROI लगभग 24.87% और सालाना IRR लगभग 4.79% आता। यानी इस उदाहरण में लोन ने रिटर्न बढ़ाया नहीं, घटाया, क्योंकि 9% का ब्याज प्रॉपर्टी की कुल कमाई (किराया लगभग 3.3% और भाव की बढ़त 5%) से भारी पड़ा।

भाव की बढ़त बदलकर देखिए। इसी लोन वाले सौदे में बढ़त 0% रहे तो कुल नतीजा लगभग −₹14,64,171 और ROI −28.66% बनता है। बढ़त 6% रहे तो फ़ायदा ₹5,44,889 और ROI 10.66% होता है। बढ़त 9% पर फ़ायदा ₹17,35,255 और ROI 33.96% है। यह तालिका दिखाती है कि लोन के साथ नतीजा भाव की बढ़त पर कितना निर्भर है।

सीमाएँ: यह calculator क्या नहीं बताता
  • आयकर, पूँजीगत लाभ कर, GST और होम लोन की कर छूट शामिल नहीं हैं।
  • किराया और खर्च पूरे समय स्थिर माने गए हैं। असल में किराया बढ़ सकता है और खर्च भी।
  • लोन की ब्याज दर स्थिर मानी गई है। Floating दर में बदलाव का असर नहीं है।
  • लोन की प्रोसेसिंग फ़ीस, बीमा और प्री-पेमेंट शामिल नहीं हैं। चाहें तो उन्हें "एक बार का खर्च" में जोड़ दीजिए।
  • ख़रीदते समय सही प्रॉपर्टी की क़ानूनी जाँच, इलाक़े की माँग और बिल्डर के जोखिम का मूल्यांकन इसमें नहीं है।
  • बिक्री में लगने वाला समय और नकदी की तंगी मॉडल में नहीं हैं।
  • भाव की बढ़त सिर्फ़ आपकी मान्यता है, उसकी कोई गारंटी नहीं। भाव गिर भी सकता है।
  • यह निवेश या कर की सलाह नहीं है। फ़ैसले से पहले अपनी स्थिति और जोखिम देखिए और ज़रूरत हो तो योग्य सलाहकार से बात कीजिए।

इसके साथ और कौन-से calculator देखें

  • किराये से सालाना आय को अलग से परखने के लिए Rental Yield Calculator।
  • लोन की किस्त जानने के लिए Home Loan EMI Calculator।
  • रहने के लिए ख़रीदें या किराये पर रहें, यह तय करने के लिए Rent vs Buy Calculator।
  • ख़रीद पर स्टांप ड्यूटी का अंदाज़ा पाने के लिए Stamp Duty Calculator।
  • मुनाफ़े पर कर जानने के लिए Capital Gains Tax Calculator।
  • प्रॉपर्टी के मोटे मूल्य का अंदाज़ा पाने के लिए Property Valuation Calculator।

6 काम की बातें याद रखें

1
भाव-बढ़त कम रखकर भी देखें

ऊँची बढ़त डालने से नतीजा अच्छा दिखता है। 0% और ऋणात्मक बढ़त भी आज़माएँ ताकि जोखिम का अंदाज़ा हो।

2
ख़रीद-बिक्री के खर्च गिनें

स्टांप ड्यूटी, रजिस्ट्री और दलाली मिलकर शुरू में ही कई प्रतिशत ले जाते हैं। छोटी अवधि में यह बोझ भारी पड़ता है।

3
खाली महीने रखें

किराया पूरे साल मिलेगा, यह मानना जोखिम है। कम से कम एक-दो खाली महीने रखकर हिसाब बनाएँ।

4
लोन की दर और कमाई की तुलना करें

अगर प्रॉपर्टी की कुल कमाई ब्याज दर से कम रहे, तो लोन से रिटर्न घटेगा।

5
अपने राज्य की ड्यूटी डालें

स्टांप ड्यूटी राज्य, क्षेत्र और ख़रीदार के प्रकार पर निर्भर होती है। उदाहरण की जगह असली दर डालें।

6
कर का अलग हिसाब करें

किराये की आय और बिक्री के मुनाफ़े पर कर लगता है और होम लोन पर छूट मिल सकती है। यह सब यहाँ नहीं है; कर-सलाहकार से पूछें।

इसके साथ ये लेख भी पढ़ें

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

ROI कुल फ़ायदे को कुल लगी अपनी रकम से भाग देता है। IRR समय को भी गिनता है: पैसा कब गया और कब आया, इसलिए सालाना दर के रूप में तुलना के लिए बेहतर है।

लोन में आपकी अपनी रकम कम लगती है, इसलिए भाव बढ़े तो रिटर्न का प्रतिशत बढ़ता है। पर ब्याज का खर्च भी है, और भाव गिरे तो नुकसान का प्रतिशत भी बढ़ता है।

अपने राज्य के नियम से या रजिस्ट्री कार्यालय से। हर राज्य में दर अलग है, इसलिए यहाँ उदाहरण का मान है।

नहीं। किराये के साथ भाव की बढ़त भी जुड़ती है, और दोनों में से खर्च और ब्याज घटते हैं।

लोन की रकम 0 रखें। तब ब्याज दर और अवधि का असर नहीं पड़ेगा।

नहीं। जब प्रॉपर्टी की कुल कमाई लोन की दर से कम रहती है, तब लोन के साथ रिटर्न कम हो जाता है, जैसा राहुल के उदाहरण में दिखा।

जब नकद-प्रवाह ऐसे हों कि सालाना दर निकल ही न सके, जैसे बहुत ज़्यादा नुकसान की स्थिति। तब सिर्फ़ ROI देखें।

बढ़त का स्लाइडर ऋणात्मक कर दें। उससे दिखता है कि गिरावट में नुकसान लोन के साथ और भी तेज़ी से बढ़ता है।

नहीं। यहाँ किराया पूरे समय स्थिर माना गया है। यह एक सीमा है, और असल में किराया बढ़ सकता है या रुक भी सकता है।

नहीं। उसके लिए Home Loan Tax Benefit calculator देखें।

नहीं। पूँजीगत लाभ कर इसमें शामिल नहीं है। उसके लिए Capital Gains Tax calculator देखें।

नहीं। चाहें तो उसे "एक बार का खर्च" में जोड़ दें।

तब EMI अवधि के आख़िर तक नहीं, लोन की अवधि तक ही चुकती मानी जाती है और उसके बाद बकाया शून्य रहता है।

गणित वही है, पर दुकान में किराया और खाली महीने, और ज़मीन में किराया शून्य होगा। अपनी स्थिति के हिसाब से इनपुट बदलें।

नहीं। यह शैक्षणिक अनुमान है। ख़रीदने का फ़ैसला आपकी ज़रूरत, नकदी, जोखिम और स्थानीय बाज़ार पर निर्भर करे।

नहीं। हर संख्या आपकी मान्यता पर टिकी है, और असली बाज़ार अलग चल सकता है।

तब किराया शून्य रखें और देखें कि भाव की बढ़त व खर्च से कुल नतीजा क्या बनता है। अपने रहने का फ़ायदा (किराया बचना) इसमें नहीं जुड़ता।

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