मान लीजिए रोहित और स्नेहा, दोनों नौकरीपेशा, ₹30 लाख का loan लेना चाहते हैं। उन्हें तीन ऑफ़र मिले:
- ऑफ़र A: 9.00% दर, 15 साल, fees ₹15,000
- ऑफ़र B: 8.75% दर, 20 साल, fees ₹30,000
- ऑफ़र C: 9.25% दर, 10 साल, fees ₹0
(ये दरें सिर्फ़ उदाहरण के लिए हैं, किसी बैंक की असली दर नहीं।) Prepayment के लिए उन्होंने ₹60,000 प्रति वर्ष रखा।
EMI: A लगभग ₹30,428, B लगभग ₹26,511, C लगभग ₹38,410।
कुल ब्याज: A लगभग ₹24,77,040, B लगभग ₹33,62,717, C लगभग ₹16,09,178।
कुल लागत (ब्याज + fees): A लगभग ₹24,92,040, B लगभग ₹33,92,717, C लगभग ₹16,09,178।
पहली नज़र में B सबसे आकर्षक लगता है, क्योंकि उसकी दर सबसे कम (8.75%) और EMI सबसे कम (₹26,511) है। लेकिन कुल लागत देखें तो B सबसे महँगा निकलता है: C से लगभग ₹17.8 लाख और A से लगभग ₹9 लाख ज़्यादा। कारण साफ़ है: 20 साल तक पैसे का बड़ा हिस्सा बैंक के पास रहता है।
इस उदाहरण में calculator ऑफ़र C को "★ सबसे सस्ता" दिखाएगा, पर साथ में यह भी दिखेगा कि C की EMI सबसे ज़्यादा है, ₹38,410 महीना। अगर जोड़े की मासिक बचत में इतनी EMI नहीं बैठती, तो C व्यावहारिक नहीं है। यहाँ A बीच का रास्ता बन सकता है।
Prepayment का असर (हर साल ₹60,000 अतिरिक्त): A लगभग 11 साल 5 महीने में ख़त्म और लगभग ₹6.5 लाख का ब्याज बचता है; B लगभग 13 साल 11 महीने में और लगभग ₹11.6 लाख की बचत; C लगभग 8 साल 5 महीने में और लगभग ₹2.8 लाख की बचत। ध्यान दें कि B में बचत सबसे ज़्यादा दिखती है क्योंकि उसमें ब्याज ही सबसे ज़्यादा बनता है। यह मत समझिए कि prepayment के बाद B सबसे अच्छा हो गया, क्योंकि उसकी कुल लागत अब भी बाक़ियों से ज़्यादा रह सकती है।
इस पर रोहित-स्नेहा ने सोचा: अगर A चुनें और EMI वही रखें, तो वे बीच-बीच में बोनस से extra देकर 15 साल का loan लगभग 11.5 साल में ख़त्म कर सकते हैं, पर ज़रूरत पड़ने पर extra रोकने की आज़ादी भी रहेगी। ऊँची EMI (C) की तुलना में यह लचीला रास्ता है।