उदाहरण 1: बाक़ी टैक्स के साथ देरी। मान लीजिए विजय एक फ्रीलांस वीडियो एडिटर है। उसकी कुल आय ₹6,50,000 है, TDS और अग्रिम कर घटाने के बाद ₹18,000 बाक़ी हैं, और वह अंतिम तारीख़ के 3 महीने बाद रिटर्न भर रहा है।
- 234A = 18,000 × 1% × 3 = ₹540।
- आय ₹5 लाख से ज़्यादा, इसलिए 234F = ₹5,000।
- कुल अतिरिक्त = 540 + 5,000 = ₹5,540।
- कुल चुकाना = 18,000 + 5,540 = ₹23,540।
ध्यान दें कि लेट फ़ीस ब्याज से कई गुना बड़ी है, इसलिए इस उदाहरण में देरी की ज़्यादातर क़ीमत एक बार लगने वाली फ़ीस की है।
उदाहरण 2: कोई टैक्स बाक़ी नहीं। कविता एक ट्यूशन टीचर है, कुल आय ₹3,50,000, कोई टैक्स बाक़ी नहीं (शायद रिफ़ंड बने), और वह 1 महीना देर से भर रही है। 234A शून्य; 234F = ₹1,000, क्योंकि आय ₹5 लाख से कम। कुल अतिरिक्त ₹1,000। यानी टैक्स न होने पर भी फ़ीस लग सकती है।
उदाहरण 3: सौ रुपये का गोल करना। किसी का बाक़ी टैक्स ₹45,678, कुल आय ₹14,00,000 और देरी 5 महीने है। टैक्स को नीचे गोल करने पर ₹45,600 बनता है। 234A = 45,600 × 1% × 5 = ₹2,280। 234F = ₹5,000। कुल अतिरिक्त = ₹7,280।
उदाहरण 4: लंबी देरी। उदाहरण 1 वाला ही विजय अगर 8 महीने देर करता, तो 234A = 18,000 × 1% × 8 = ₹1,440, और 234F वही ₹5,000, यानी कुल ₹6,440। पर तब पेज चेतावनी देता कि 5 महीने से ज़्यादा देर पर सामान्य belated रास्ता शायद बंद हो चुका हो और ITR-U का रास्ता ही बचे, जिसमें अतिरिक्त टैक्स लगता है। ये सब काल्पनिक आँकड़े हैं।