मान लीजिए विवेक और नेहा, दोनों नौकरी करते हैं, मिलाकर हाथ में ₹1,20,000 महीना आता है। उन पर एक पर्सनल लोन की ₹8,000 की EMI चल रही है। वे पहली कार लेना चाहते हैं।
इनपुट: आय ₹1,20,000; मौजूदा EMI ₹8,000; FOIR 40%; दर 9.5% (मान लीजिए); अवधि 5 साल; डाउन पेमेंट 20%।
चरण 1: आय का 40% = ₹48,000; मौजूदा EMI घटाने पर नई EMI की गुंजाइश = ₹40,000।
चरण 2: 5 साल (60 महीने) और 9.5% पर, ₹40,000 की EMI से लोन लगभग ₹19,04,593।
चरण 3: डाउन पेमेंट 20% के साथ कार की क़ीमत = 19,04,593 ÷ 0.8 ≈ ₹23,80,741। यानी अपनी रकम लगभग ₹4,76,148।
चरण 4: कुल वापसी 40,000 × 60 = ₹24,00,000; कुल ब्याज ≈ ₹4,95,407।
पहली नज़र में लगता है कि वे ₹23.8 लाख तक की कार ले सकते हैं। अब "आराम की सीमा" देखिए: आय का 15% = ₹18,000 की EMI, तब लोन ≈ ₹8,57,067 और कार ≈ ₹10,71,334। यानी बैंक की सीमा और आराम की सीमा के बीच ₹13 लाख का फ़ासला है। यह फ़ासला ही असली संदेश है। विवेक-नेहा ने बजट ₹12 लाख के आसपास रखा, जिसमें बीमा, पेट्रोल और सर्विस का ख़र्च भी आराम से निकले।
अवधि वाली तालिका से: 3 साल पर लोन ≈ ₹12,48,714 और क़ीमत ≈ ₹15,60,893; 4 साल पर लोन ≈ ₹15,92,158 और क़ीमत ≈ ₹19,90,197; 7 साल पर लोन ≈ ₹24,47,384 और क़ीमत ≈ ₹30,59,230। ध्यान दें कि अवधि जितनी लंबी, उतनी बड़ी कार "दिखती" है, पर साथ में कुल ब्याज भी बढ़ता है और कार की क़ीमत लोन के चलते-चलते घटती जाती है।