मान लीजिए नेहा और राकेश एक सरकारी स्कूल के शिक्षक दंपती हैं। वे 12 साल बाद अपने बेटे की प्रोफ़ेशनल पढ़ाई के लिए रकम चाहते हैं। आज उस पढ़ाई की कुल लागत लगभग ₹25 लाख है। उन्होंने इसके लिए पहले से ₹2 लाख अलग रखे हैं। वे पढ़ाई की महँगाई 7% और निवेश पर रिटर्न 11% मानते हैं। ये सिर्फ़ मान्यताएँ हैं, असली संख्या अलग हो सकती है।
चरण 1: भविष्य की लागत। 25,00,000 × (1.07) की घात 12 = लगभग ₹56,30,479। यानी लागत में लगभग ₹31,30,479 की बढ़ोतरी।
चरण 2: पुरानी बचत का भविष्य। 2,00,000 × (1.11) की घात 12 = लगभग ₹6,99,690।
चरण 3: कमी। 56,30,479 − 6,99,690 = लगभग ₹49,30,789।
चरण 4: मासिक SIP। मासिक दर 11 ÷ 12 ÷ 100 और 144 किस्तों के गुणक से कमी को भाग देने पर मासिक SIP लगभग ₹16,460 आती है।
चरण 5: कुल जमा। 16,460 × 144 = लगभग ₹23.7 लाख। यानी बाक़ी रकम निवेश की बढ़त से आने की मान्यता है।
चरण 6: lumpsum विकल्प। अगर वे SIP की जगह आज एक बार रकम लगाएँ, तो 49,30,789 ÷ (1.11) की घात 12 = लगभग ₹14,09,421 काफ़ी होगी।
अब ये बदलाव आज़माइए। अगर महँगाई 5% हो, तो SIP लगभग ₹12,652 रह जाती है। अगर महँगाई 9% हो, तो SIP लगभग ₹21,138 हो जाती है। और अगर महँगाई 7% रहे पर रिटर्न 9% ही मिले, तो SIP लगभग ₹19,519 चाहिए। यानी सिर्फ़ मान्यताएँ बदलने से सुझाई गई मासिक रकम में ₹8,000 से ज़्यादा का फ़र्क आ गया। इसीलिए एक अकेले नतीजे पर टिके रहना ठीक नहीं।