न्यू टैक्स रिजीम vs ओल्ड टैक्स रिजीम
25 जरूरी सवाल — आसान हिंदी में जवाब
यह सारे FAQs इस article से बने हैं
न्यू टैक्स रिजीम या ओल्ड टैक्स रिजीम — कौन सी बेहतर है?
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इस पेज के सभी सवाल (25)
- न्यू टैक्स रिजीम और ओल्ड टैक्स रिजीम में मुख्य फर्क क्या है?
- टैक्स ईयर 2026-27 में नई रिजीम के स्लैब क्या हैं?
- पुरानी रिजीम के स्लैब क्या हैं और सीनियर सिटीजन के लिए क्या अलग है?
- Income-tax Act 2025 आने से टैक्स के नियम क्या बदले हैं?
- नई और पुरानी रिजीम में स्टैंडर्ड डिडक्शन कितना मिलता है?
- अगर मैं कुछ न चुनूँ तो कौन-सी रिजीम लागू होती है?
- 80C, 80D और HRA जैसी कौन-सी छूटें नई रिजीम में बंद हैं?
- नई रिजीम चुनने पर भी किन कटौतियों का फायदा बचा रहता है?
- ₹12 लाख तक की आय पर टैक्स ज़ीरो कैसे हो जाता है?
- सैलरी वालों के लिए टैक्स-फ्री सीमा ₹12.75 लाख क्यों कही जाती है?
- टैक्सेबल आय ₹12 लाख से थोड़ी ऊपर हो तो क्या होता है?
- सरचार्ज और 4% सेस टैक्स में कैसे जुड़ते हैं?
- ₹10 लाख की सैलरी पर दोनों रिजीम में टैक्स का उदाहरण दीजिए?
- ₹15 लाख की सैलरी पर पुरानी रिजीम कब फायदे में पड़ सकती है?
- ₹30 लाख की आय पर नई रिजीम में टैक्स कैसे निकलता है?
- HRA और होम लोन वाले लोग रिजीम चुनते समय क्या देखें?
- सीनियर सिटीजन या रिटायर्ड व्यक्ति दोनों रिजीम की तुलना कैसे करें?
- नौकरी में employer को रिजीम कैसे बताएँ और ITR में क्या होता है?
- क्या नौकरी वाला व्यक्ति हर साल रिजीम बदल सकता है?
- बिज़नेस या प्रोफेशन की आय हो तो रिजीम बदलने के नियम क्या हैं?
- ITR देर से भरने पर क्या पुरानी रिजीम का विकल्प चला जाता है?
- क्या ₹12 लाख वाला रेबेट कैपिटल गेन पर भी मिलता है?
- क्या NRI को भी ₹12 लाख वाला रेबेट मिलता है?
- अगर मैं नई रिजीम चुनूँ तो क्या PPF या ELSS में निवेश बंद कर दूँ?
- 80C, 87A और 115BAC जैसे पुराने सेक्शन नंबर नए Act में क्या हैं?
दोनों इनकम टैक्स चुकाने के दो अलग तरीके हैं। नई रिजीम में टैक्स की दरें अपेक्षाकृत कम हैं (₹4 लाख तक शून्य, फिर 5% से 30% तक), लेकिन ज़्यादातर कटौतियाँ और छूट नहीं मिलतीं। पुरानी रिजीम में दरें ऊँची हैं, पर 80C, 80D, HRA और होम लोन ब्याज जैसी कई कटौतियाँ मिलती हैं। यानी एक में कम दर और कम छूट है, दूसरी में ज़्यादा दर और ज़्यादा छूट। नई रिजीम अब डिफ़ॉल्ट है। कौन-सी सस्ती पड़ेगी, यह आपकी आय और कटौतियों पर निर्भर करता है।
₹4 लाख तक की आय पर टैक्स शून्य है। इसके बाद ₹4–8 लाख पर 5%, ₹8–12 लाख पर 10%, ₹12–16 लाख पर 15%, ₹16–20 लाख पर 20%, ₹20–24 लाख पर 25% और ₹24 लाख से ऊपर 30% लगता है। यह दर हर हिस्से पर अलग-अलग लगती है, पूरी आय पर एक साथ नहीं। उदाहरण: ₹10 लाख की टैक्सेबल आय पर ₹20,000 (₹4–8 लाख पर) और ₹20,000 (₹8–10 लाख पर) मिलाकर ₹40,000 टैक्स बनता है, ऊपर से 4% सेस। Budget 2026 में ये स्लैब नहीं बदले।
60 साल से कम उम्र वालों के लिए पुरानी रिजीम में ₹2.5 लाख तक शून्य, ₹2.5–5 लाख पर 5%, ₹5–10 लाख पर 20% और ₹10 लाख से ऊपर 30% टैक्स है। 60 से 80 साल के सीनियर सिटीजन के लिए शून्य टैक्स की सीमा ₹3 लाख है, और 80 साल से ऊपर वालों के लिए ₹5 लाख। उम्र के हिसाब से यह अलग छूट केवल पुरानी रिजीम में है; नई रिजीम में सबके लिए एक ही स्लैब हैं। इन सब पर 4% सेस अलग से जुड़ता है।
नया Income-tax Act, 2025 एक अप्रैल 2026 से लागू है और 1961 वाले कानून की जगह लेता है। अब "फाइनेंशियल ईयर" और "असेसमेंट ईयर" की जगह एक ही "टैक्स ईयर" शब्द है, जैसे टैक्स ईयर 2026-27। धाराओं के नंबर बदले हैं, पर Budget 2026 में स्लैब, रेबेट और कटौतियाँ वही रखी गईं। ध्यान रहे कि FY 2025-26 की कमाई (AY 2026-27) की ITR अब भी पुराने कानून और पुराने फॉर्म से भरी गई है, जबकि अप्रैल 2026 से शुरू हुए साल पर नया कानून लागू होता है।
स्टैंडर्ड डिडक्शन सैलरी या पेंशन पाने वालों की आय से बिना किसी बिल के घटाई जाती है। नई रिजीम में यह ₹75,000 है, जबकि पुरानी रिजीम में ₹50,000। उदाहरण: ₹10 लाख की सैलरी पर नई रिजीम में गणना ₹9.25 लाख पर होगी, और पुरानी रिजीम में अन्य कटौतियों से पहले ₹9.5 लाख पर। बिज़नेस या प्रोफेशन से कमाने वालों को यह कटौती नहीं मिलती। नौकरी बदलने पर भी साल भर में कुल कटौती इसी सीमा तक रहती है, हर employer से अलग-अलग नहीं।
Finance Act 2023 के बाद नई रिजीम डिफ़ॉल्ट है। अगर नौकरी करने वाला व्यक्ति employer को कुछ न बताए और ITR में भी पुरानी रिजीम का विकल्प न चुने, तो टैक्स नई रिजीम के हिसाब से ही गिना जाता है। पुरानी रिजीम चाहिए तो employer को अपनी पसंद बतानी होती है और ITR भरते समय "opt out" वाला विकल्प भी चुनना पड़ता है। नए Act में यह व्यवस्था सेक्शन 202 में है, जो पहले सेक्शन 115BAC कहलाता था।
आम तौर पर 80C, 80D (हेल्थ इंश्योरेंस), 80E (एजुकेशन लोन ब्याज), 80G (दान) जैसी Chapter VI-A वाली कटौतियाँ इस रिजीम में नहीं मिलतीं। HRA और LTA की छूट तथा खुद रहने वाले घर के होम लोन ब्याज (₹2 लाख तक) की कटौती भी नहीं है। यानी इन पर खर्च करने से आपका टैक्स नहीं घटेगा, पर खर्च या निवेश का अपना असली फायदा अपनी जगह बना रहता है। पूरी सूची के लिए आयकर विभाग की वेबसाइट देखें।
कुछ कटौतियाँ नई रिजीम में भी मिलती हैं:
1) सैलरी या पेंशन वालों के लिए ₹75,000 की स्टैंडर्ड डिडक्शन
2) employer की ओर से NPS में जमा राशि, बेसिक सैलरी के 14% तक
3) Agniveer Corpus Fund में योगदान
इसके अलावा कुछ और विशेष कटौतियाँ भी हैं, जो आपकी आय के प्रकार पर निर्भर करती हैं। ध्यान रखें, अपने खुद के NPS योगदान पर मिलने वाली अतिरिक्त ₹50,000 की कटौती नई रिजीम में उपलब्ध नहीं है।
1) सैलरी या पेंशन वालों के लिए ₹75,000 की स्टैंडर्ड डिडक्शन
2) employer की ओर से NPS में जमा राशि, बेसिक सैलरी के 14% तक
3) Agniveer Corpus Fund में योगदान
इसके अलावा कुछ और विशेष कटौतियाँ भी हैं, जो आपकी आय के प्रकार पर निर्भर करती हैं। ध्यान रखें, अपने खुद के NPS योगदान पर मिलने वाली अतिरिक्त ₹50,000 की कटौती नई रिजीम में उपलब्ध नहीं है।
सेक्शन 87A (नए Act में सेक्शन 156) के तहत यहाँ रेबेट मिलता है। ₹12 लाख की टैक्सेबल आय पर स्लैब के हिसाब से टैक्स ₹20,000 + ₹40,000 = ₹60,000 बनता है, और रेबेट अधिकतम ₹60,000 का है, इसलिए पूरा टैक्स माफ हो जाता है। यह रेबेट सिर्फ रेसिडेंट व्यक्तियों के लिए है। पुरानी रिजीम में रेबेट बहुत छोटा है: टैक्सेबल आय ₹5 लाख तक होने पर अधिकतम ₹12,500।
उदाहरण: सैलरी ₹12.75 लाख है। नई रिजीम में ₹75,000 स्टैंडर्ड डिडक्शन घटाने पर टैक्सेबल आय ₹12 लाख रह जाती है। इस पर स्लैब से टैक्स ₹60,000 बनता है, जो रेबेट से पूरा माफ हो जाता है। इसलिए वेतनभोगियों के लिए टैक्स-फ्री सीमा व्यवहार में ₹12.75 लाख तक पहुँचती है। ध्यान दें कि बिज़नेस या प्रोफेशन की आय पर स्टैंडर्ड डिडक्शन नहीं मिलती, इसलिए वहाँ यह सीमा ₹12 लाख की टैक्सेबल आय रहती है।
ऐसे में मार्जिनल रिलीफ मिलता है, ताकि टैक्स आय की बढ़त से ज़्यादा न हो। उदाहरण: टैक्सेबल आय ₹12.25 लाख है। स्लैब से टैक्स ₹60,000 + 15% × ₹25,000 = ₹63,750 बनता है। पर ₹12 लाख से ऊपर की आय केवल ₹25,000 है, इसलिए टैक्स ₹25,000 तक सीमित हो जाता है (सेस ₹1,000 अलग)। आय बढ़ने पर यह राहत धीरे-धीरे घटती है और लगभग ₹12.7 लाख के आसपास खत्म होकर सामान्य गणना लागू हो जाती है।
पहले स्लैब से टैक्स निकलता है, फिर रेबेट या मार्जिनल रिलीफ घटाया जाता है, और आखिर में 4% हेल्थ एंड एजुकेशन सेस जुड़ता है। उदाहरण: टैक्स ₹93,750 हो तो सेस ₹3,750 और कुल देनदारी ₹97,500। ₹50 लाख से ऊपर की आय पर सरचार्ज भी लगता है: ₹50 लाख से ₹1 करोड़ पर 10%, ₹1 से ₹2 करोड़ पर 15%, उसके ऊपर 25%। नई रिजीम में सरचार्ज की ऊँची सीमा 25% है, जबकि पुरानी रिजीम में ₹5 करोड़ से ऊपर 37% तक जा सकती है।
उदाहरण: सैलरी ₹10 लाख, और पुरानी रिजीम में ₹1.5 लाख की 80C कटौती मान लें।
1) नई रिजीम: ₹75,000 घटाकर टैक्सेबल आय ₹9.25 लाख। स्लैब का टैक्स ₹32,500, पर रेबेट से टैक्स शून्य।
2) पुरानी रिजीम: ₹50,000 और ₹1.5 लाख घटाकर ₹8 लाख। टैक्स ₹12,500 + ₹60,000 = ₹72,500, सेस सहित ₹75,400।
इस उदाहरण में नई रिजीम सस्ती रही। पर HRA या होम लोन ब्याज जैसी बड़ी कटौतियाँ हों तो पुरानी रिजीम का नतीजा बदल सकता है।
1) नई रिजीम: ₹75,000 घटाकर टैक्सेबल आय ₹9.25 लाख। स्लैब का टैक्स ₹32,500, पर रेबेट से टैक्स शून्य।
2) पुरानी रिजीम: ₹50,000 और ₹1.5 लाख घटाकर ₹8 लाख। टैक्स ₹12,500 + ₹60,000 = ₹72,500, सेस सहित ₹75,400।
इस उदाहरण में नई रिजीम सस्ती रही। पर HRA या होम लोन ब्याज जैसी बड़ी कटौतियाँ हों तो पुरानी रिजीम का नतीजा बदल सकता है।
उदाहरण: सैलरी ₹15 लाख। नई रिजीम में टैक्सेबल आय ₹14.25 लाख, टैक्स ₹60,000 + 15% × ₹2.25 लाख = ₹93,750। इतना ही टैक्स पुरानी रिजीम में तब बनेगा जब टैक्सेबल आय लगभग ₹9.06 लाख हो, यानी कुल कटौतियाँ (स्टैंडर्ड डिडक्शन सहित) लगभग ₹5.94 लाख हों। जैसे ₹50,000 + ₹1.5 लाख 80C + ₹50,000 NPS + ₹2 लाख होम लोन ब्याज = ₹4.5 लाख, बाकी लगभग ₹1.44 लाख HRA, 80D आदि से आना होगा। इससे ज़्यादा कटौतियाँ हों तभी पुरानी रिजीम सस्ती पड़ेगी।
उदाहरण: टैक्सेबल आय ₹30 लाख, कोई रेबेट नहीं। हिस्से-हिस्से में टैक्स निकलता है: ₹4–8 लाख पर ₹20,000, ₹8–12 लाख पर ₹40,000, ₹12–16 लाख पर ₹60,000, ₹16–20 लाख पर ₹80,000, ₹20–24 लाख पर ₹1,00,000, यानी ₹24 लाख तक ₹3,00,000। बाकी ₹6 लाख पर 30% यानी ₹1,80,000 जुड़ता है। कुल ₹4,80,000, और 4% सेस ₹19,200 जोड़कर ₹4,99,200। इस आय पर सरचार्ज नहीं लगता, क्योंकि वह ₹50 लाख से ऊपर शुरू होता है।
दोनों कटौतियाँ पुरानी रिजीम में ही मिलती हैं, इसलिए पहले उनकी रकम निकालें। HRA की छूट तीन में से सबसे कम रकम होती है: मिला हुआ HRA, चुकाया किराया में से सैलरी (बेसिक+DA) का 10% घटाकर, और बेसिक का 50% या 40%। नए नियमों में दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता के साथ बेंगलुरु, पुणे, हैदराबाद और अहमदाबाद में भी 50% की गणना बताई गई है। खुद रहने वाले घर के ब्याज पर ₹2 लाख तक की कटौती भी पुरानी रिजीम में है। फिर दोनों रिजीम का टैक्स आमने-सामने रखें।
पेंशन पर भी स्टैंडर्ड डिडक्शन मिलती है: नई रिजीम में ₹75,000 और पुरानी में ₹50,000। पुरानी रिजीम में 60+ को ₹3 लाख और 80+ को ₹5 लाख तक की बेसिक छूट है, पर नई रिजीम में उम्र का अलग स्लैब नहीं है; वहाँ ₹4 लाख तक शून्य और ₹12 लाख तक रेबेट है। पेंशन, FD का ब्याज, किराया और 80D प्रीमियम जैसी सारी आय-कटौतियाँ जोड़कर दोनों रिजीम का टैक्स निकालना चाहिए। यह हर व्यक्ति की स्थिति पर निर्भर करता है।
आम तौर पर साल की शुरुआत में employer अपने पोर्टल या फॉर्म से रिजीम चुनवाता है और उसी के आधार पर हर महीने TDS काटता है। कुछ न बताने पर आम तौर पर नई रिजीम मानी जाती है। असली अंतिम चुनाव ITR भरते समय होता है, जहाँ आप दूसरी रिजीम भी चुन सकते हैं, बशर्ते ITR समय पर भरें। उदाहरण: employer ने नई रिजीम में TDS काटा, पर आपके लिए पुरानी सस्ती निकली, तो ITR में चुनने पर ज़्यादा कटा टैक्स रिफंड हो सकता है।
हाँ। जिसके पास बिज़नेस या प्रोफेशन की आय नहीं है, वह हर साल अपनी सुविधा से नई या पुरानी रिजीम चुन सकता है। उदाहरण: इस साल होम लोन ब्याज और 80C की वजह से पुरानी रिजीम सस्ती रही, पर अगले साल लोन चुकने के बाद नई रिजीम बेहतर लगे, तो अगले साल वह चुनी जा सकती है। हर साल की पसंद उसी साल की ITR में दर्ज होती है। इसलिए पिछले साल का चुनाव अपने-आप सही न मानें और हर साल अपनी कटौतियाँ जोड़कर दोनों रिजीम देखें।
बिज़नेस या प्रोफेशन की आय वालों के लिए नियम सख्त हैं। नई रिजीम डिफ़ॉल्ट है। पुरानी रिजीम चुनने के लिए ITR की ड्यू डेट से पहले अलग फॉर्म भरना होता है (1961 वाले कानून में यह Form 10-IEA था)। पुरानी रिजीम चुनने के बाद नई रिजीम में लौटने का मौका जीवन में सिर्फ एक बार मिलता है, और लौटने के बाद दोबारा पुरानी रिजीम चुनने पर रोक रहती है। इसलिए ऐसे करदाताओं को फैसला सोच-समझकर और ज़रूरत हो तो CA से पूछकर लेना चाहिए।
नौकरी वाले जिन करदाताओं की बिज़नेस आय नहीं है, उन्हें पुरानी रिजीम का विकल्प ITR में ड्यू डेट तक चुनना होता है (सैलरी वालों के लिए आम तौर पर 31 जुलाई)। नियमों की सामान्य समझ यह है कि ड्यू डेट के बाद belated रिटर्न भरने पर नई रिजीम ही लागू रहती है, यानी 80C, HRA, 80D जैसी कटौतियाँ छूट सकती हैं। उदाहरण: पुरानी रिजीम में ₹30,000 टैक्स कम होता, पर देरी से रिटर्न भरने पर वह फायदा नहीं मिला। इसलिए डेडलाइन पहले से कैलेंडर में रखें और अपने मामले की पुष्टि आधिकारिक पोर्टल से करें।
जरूरी नहीं। Budget 2025 में स्पष्ट किया गया कि 87A रेबेट उस टैक्स पर नहीं मिलता जो स्पेशल रेट वाली आय पर बनता है, जैसे शेयर या इक्विटी म्यूचुअल फंड के शॉर्ट-टर्म गेन (सेक्शन 111A) और लॉन्ग-टर्म गेन (सेक्शन 112A)। इक्विटी के लॉन्ग-टर्म गेन पर साल में ₹1.25 लाख तक की छूट अलग से है। जब आय में स्लैब वाली सैलरी और स्पेशल रेट वाले गेन दोनों हों, तो गणना पेचीदा हो जाती है। ऐसे में ITR टूल या CA की मदद से अपनी पूरी गणना जाँच लें।
सेक्शन 87A का रेबेट (नए Act में सेक्शन 156) सिर्फ रेसिडेंट इंडिविजुअल के लिए है। इसलिए NRI की आय ₹12 लाख से कम हो, तब भी स्लैब के हिसाब से टैक्स बन सकता है। पुरानी रिजीम की सीनियर सिटीजन वाली ऊँची छूट भी रेसिडेंट के लिए है। नई रिजीम का ₹4 लाख तक शून्य स्लैब सब पर लागू होता है। रेसिडेंट या NRI होने का फैसला उस साल भारत में बिताए दिनों के नियमों से होता है, इसलिए पहले अपना स्टेटस पक्का करें।
टैक्स कटौती न मिलने से सिर्फ 80C (अब 123) का फायदा जाता है; निवेश का अपना मकसद खत्म नहीं होता। PPF, ELSS, NPS या बीमा रिटायरमेंट, बच्चों की पढ़ाई या जोखिम कवर जैसे लक्ष्यों के लिए भी इस्तेमाल होते हैं। PPF का ब्याज और maturity टैक्स-फ्री रहती है, चाहे रिजीम कोई भी हो। ELSS में बाजार का जोखिम और 3 साल का लॉक-इन होता है। इसलिए निवेश का फैसला अपने लक्ष्य, समय-सीमा और जोखिम क्षमता के हिसाब से होता है, केवल टैक्स कटौती के लिए नहीं।
Income-tax Act 2025 में कई धाराओं को नए नंबर मिले हैं। नई रिजीम वाली 115BAC अब सेक्शन 202 है, रेबेट वाली 87A अब सेक्शन 156 है, और 80C की कटौती अब सेक्शन 123 है, जिसकी पात्र चीज़ें Schedule XV में दी गई हैं। रकम और शर्तें वही हैं, सिर्फ नंबर बदले हैं। FY 2025-26 की ITR और Form 16 में पुराने नंबर दिखेंगे, जबकि अप्रैल 2026 से शुरू हुए साल के लिए नए। पुराने और नए नंबर मिलाने के लिए आयकर विभाग की वेबसाइट पर Act से जुड़े FAQs और सूचियाँ देखी जा सकती हैं।
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